-डॉ प्रमोद कुमार प्रोफेसर, खरगोन
भारत रत्न बाबा साहेब अम्बेडकर भारत देश की समरसता के केन्द्र बिंदु थे। बाबा साहेब की दूरदृष्टी, उनका ज्ञान, लोगो को समझाने का तरीका एवं जाति प्रथा के विरुद्ध उनके दृष्टिकोण को देखते हुए बाबा साहेब को भारतीय संविधान का अध्यक्ष चुना गया था। आज यदि भारत का संविधान पूरे विश्व के संविधान में सर्वश्रेष्ठ हैं,तो इसका श्रेय बाबा साहेब को जाता हैं। बाबा साहेब के नेतृत्व में रचित भारत का संविधान हमारे लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में खड़ा हुआ हैं। डॉ भीमराव अंबेडकर का जीवन दर्शन आज भी प्रासंगिक है क्योंकि इसने भारत की समरसता एवं सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने कार्य किया हैं। देश में हर वर्ष 14 अप्रैल को भारत रत्न बाबासाहेब डा. भीमराव आम्बेडकर की जयन्ती मनायी जाती है। बाबासाहेब की जयंती पर हमें ये संकल्प लेना चाहिये कि हम सब एक रूप से बाबा साहेब के बताये मार्ग का पूर्ण ईमानदारी से पालन करे। आज बाबा साहेब की जयंती पर उनको श्रद्धांजलि देने का सबसे अच्छा मार्ग हे उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में आत्मसात करना बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में एक गरीब परिवार में हुआ था। वो भीमराव रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14 वीं सन्तान थे। उनका परिवार मराठी था जो महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित अम्बावडे नगर से सम्बंधित था। उनके बचपन का नाम रामजी सकपाल था। वे हिंदू महार जाति के थे। अंग्रेजों के समय उनकी जाति के साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। एक अस्पृश्य परिवार में जन्म लेने के कारण उनको अपनी बाल्यावस्था को बहुत ही दुःख एवं कष्ट में बिताना पड़ा था। बाबा साहेब अम्बेडकर कुल 64 विषयों में मास्टर थे। वे हिन्दी, पाली, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, पर्शियन और गुजराती जैसी 9 भाषाओं के जानकार थे। इसके अलावा उन्होंने लगभग 21 साल तक विश्व के सभी धर्मों की तुलनात्मक रूप से पढ़ाई की थी। बाबा साहेब अकेले ऐसे भारतीय है जिनकी प्रतिमा लंदन स्थित संग्रहालय में कार्ल माक्र्स के साथ लगाई गई है। इतना ही नहीं उन्हें देश विदेश में कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले है। बाबा साहेब के पास कुल 32 डिग्री थी एवं निजी पुस्तकालय राजगृह में 50 हजार से भी अधिक किताबें थी। यह विश्व का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय हैं। बाबा साहेब का मानना था कि वर्गहीन समाज गढ़ने से पहले समाज को जाति विहीन करना होगा। आज महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए हमारे पास जो भी संवैधानिक सुरक्षाकवच, कानूनी प्रावधान और संस्थागत उपाय मौजूद हैं। इसका श्रेय किसी एक मनुष्य को जाता है तो वे हैं डॉ. भीमराव आम्बेडकर। भारतीय संदर्भ में जब भी समाज में व्याप्त जाति, वर्ग और लिंग के स्तर पर व्याप्त असमानताओं और उनमें सुधार के मुद्दों पर चिंतन हो तो डॉ. आंबेडकर के विचारों और दृष्टिकोण को शामिल किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती।
भारतीय संविधान के रचिता डॉ. भीमराव आम्बेडकर का सपना था कि भारत जाति-मुक्त हो, औद्योगिक राष्ट्र बने, सदैव लोकतांत्रिक बना रहे।आज लोग बाबा साहेब आम्बेडकर को एक दलित नेता के रूप में जानते है। जबकि उन्होने बचपन से ही जाति प्रथा का खुलकर विरोध किया था इसलिए राष्ट्र के अनमोल रत्नों में उनका नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता हैं। उन्होंने जातिवाद से मुक्त आर्थिक दृष्टि से सुहढ़ भारत का सपना देखा था। डा. आम्बेडकर का एक और सपना भी था कि समाज के अंतिम छोर का व्यक्ति भी धनवान बनें। वे हमेशा नौकरी मांगने वाले ही न बने रहें अपितु नौकरी देने वाले भी बनें इस भावना के साथ अपने लक्ष्यों की और विभिन्न बाधाओं के साथ बढ़ते रहे।
भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो आम्बेडकर संभवतः पहले अध्येता रहे हैं। जिन्होंने जातीय संरचना में महिलाओं की स्थिति को समझने की कोशिश की थी। उनके संपूर्ण विचार मंथन के दृष्टिकोण में सबसे महत्वपूर्ण मंचन का हिस्सा महिला सशक्तिकरण था। बाबा साहेब यह बात समझते थे कि स्त्रियों की स्थिति सिर्फ ऊपर से उपदेश देकर नहीं सुधरने वाली, उसके लिए कानूनी व्यवस्था करनी होगी। हिंदू कोड बिल महिला सशक्तिकरण का असली आविष्कार है। इसी कारण आंबेडकर हिंदू कोड बिल लेकर आए थे पर अफसोस यह बिल संसद में पारित नहीं हो पाया और इसी कारण आम्बेडकर ने कानून मंत्री पद का इस्तीफा दे दिया था।
डा. भीमराव आम्बेडकर का मानना था कि भारतीय महिलाओ के पिछड़ेपन की मूल वजह भेदभावपूर्ण समाज व्यवस्था और शिक्षा का अभाव है। शिक्षा में समानता के संदर्भ में आंबेडकर के विचार स्पष्ट थे। उनका मानना था कि यदि हम लडकों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान देने लग जाए तो राष्ट्र प्रगति कर सकता है। शिक्षा पर किसी एक ही वर्ग का अधिकार नहीं है। समाज के प्रत्येक वर्ग को शिक्षा का समान अधिकार है। नारी तो शिक्षा पुरुष शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
जब 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद नई सरकार बनी तो उसमें डा. भीमराव अंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री नियुक्त किया गया। 29 अगस्त 1947 को डा. आम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने उनके नेतृत्व में बने संविधान को राष्ट्र ने अपना लिया गया। अपने कार्य को पूर्ण करने के बाद बोलते हुए डा. अम्बेडकर ने कहा की मैं महसूस करता हूं कि भारत का संविधान साध्य है, लचीला है पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि राष्ट्र को शांति और युद्ध दोनों समय जोड़ कर रखने में सक्षम होगा। मैं कह सकता हूं कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य ही गलत था।
वर्ष 1990 में बाबासाहेब डा. आम्बेडकर को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। पूर्ववर्ती सरकारों की उपेक्षाओं के चलते बाबा साहेब को भारत रन सम्मान बहुत देर से प्रदान किया गया। अंततः बाबा साहेब को भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न देकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी गई।
उनके दिल्ली स्थित 26 अलीपुर रोड के घर में एक स्मारक स्थापित किया गया है जहां वो सांसद के रूप रहते थे। बाबा साहेब का एक बड़ा चित्र भारतीय संसद भवन में भी लगाया गया है। जो राष्ट्र की समरसता का सूचक हैं। बाबा साहब ने शिक्षित बनो, संगठित रहो तथा संघर्ष करो का नारा दिया था। शिक्षित बनने का अर्थ है कि हमारे ज्ञान के द्वार सदैव खुले रहे एवं संगठित रहने का अर्थ है राष्ट्र को एकता की शक्ति प्रदान करना। आज हम ये संकल्प लें कि बाबा साहेब के सिद्धांतों को अपनाए एवं भारत के इस अद्वितीय अनमोल रत्न को सच्ची श्रद्धांजलि दें।
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